प्रभात न्यूज़ 24:
जन्मदिवस विशेष (6 मई)
जनसेवा, न्याय और विकास की त्रिवेणी — पं. बंशराज तिवारी का प्रेरणादायी जीवन
बलौदाबाजार।
छत्तीसगढ़ की राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक चेतना के इतिहास में पं. बंशराज तिवारी का नाम एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह सदैव स्मरण किया जाएगा। वे केवल एक जनप्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि सिद्धांत, संघर्ष और समर्पण के जीवंत प्रतीक थे। एक कुशल अधिवक्ता, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सिद्धांतनिष्ठ विधायक और समर्पित समाजसेवी के रूप में उन्होंने जनसेवा को अपना धर्म बनाया और विकास को अपना लक्ष्य।
संघर्षों से गढ़ा व्यक्तित्व
6 मई 1925 को एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे पं. बंशराज तिवारी, पं. महावीर प्रसाद तिवारी के सुपुत्र थे। वे अपनी तीन बहनों में इकलौते भाई थे। बाल्यकाल में ही पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं। इन परिस्थितियों ने उनके व्यक्तित्व को संघर्षशील और आत्मनिर्भर बनाया। कठिनाइयों के बीच उन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण की और अल्पायु में ही सामाजिक नेतृत्व की भूमिका निभानी शुरू कर दी।
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी
1940 में उन्होंने ‘पटेल’ पद से त्यागपत्र देकर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का मार्ग चुना। वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और राष्ट्रसेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1946 में समाजवादी विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की, लेकिन उनके लिए राजनीति सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम थी।
न्याय के प्रति समर्पित अधिवक्ता
एक अधिवक्ता के रूप में पं. तिवारी ने न्याय को केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा। उनके लिए वकालत पेशा नहीं, बल्कि शोषित, वंचित और जरूरतमंदों को न्याय दिलाने का पवित्र माध्यम थी।
बलौदाबाजार बार एसोसिएशन के सचिव के रूप में उन्होंने न केवल न्यायिक व्यवस्था को मजबूत किया, बल्कि बलौदाबाजार को जिला बनाने और छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को मजबूती से उठाया।
आपातकाल में लोकतंत्र के प्रहरी
देश में आपातकाल के दौरान जब लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट आया, तब पं. बंशराज तिवारी ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने दमन और भय के आगे झुकने के बजाय लोकतंत्र की रक्षा के लिए खुलकर आवाज उठाई। राजद्रोह जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए उन्होंने जेल यात्रा भी की, जहां वे राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं के साथ रहे। यह दौर उनके राजनीतिक और वैचारिक व्यक्तित्व को और अधिक सशक्त बनाने वाला साबित हुआ।
विकासपुरुष के रूप में पहचान
1977 में जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर वे बलौदाबाजार के विधायक बने। उनका कार्यकाल भले ही अल्प रहा, लेकिन उपलब्धियां अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली रहीं।
उन्होंने अपने क्षेत्र में विकास की नई इबारत लिखी—
शिवनाथ नदी से जल प्रदाय योजना
अतिरिक्त सत्र न्यायालय की स्थापना
निजी महाविद्यालय का शासकीयकरण
टेलीफोन एक्सचेंज और डाकघर की स्थापना
शासकीय अस्पताल का विस्तार
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुल-पुलिया और पेयजल व्यवस्था
इन कार्यों के कारण उन्हें “विकासपुरुष” के रूप में सम्मानित किया गया।
आदर्श पारिवारिक जीवन
पं. तिवारी ने अपने पारिवारिक जीवन में भी उच्च आदर्श स्थापित किए। अपनी पत्नी श्रीमती चंदा देवी के साथ मिलकर उन्होंने अपने बच्चों में सेवा, समर्पण और त्याग के संस्कार विकसित किए। उनका परिवार आज भी उन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ा रहा है।
सेवा की परंपरा आज भी जारी
9 फरवरी 2006 को उनके निधन के बाद भी उनकी सेवा भावना जीवित है। पिछले 20 वर्षों से उनके परिवार द्वारा निःशुल्क रोग निदान शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जिनसे हजारों लोग लाभान्वित हुए हैं।
इसके अलावा, उनके परिवार ने समाजहित में भूमि दान कर विकास कार्यों को आगे बढ़ाया और राष्ट्रसेवा की भावना को जीवंत रखा।
अमर रहेगा योगदान
पं. बंशराज तिवारी का संपूर्ण जीवन मानवता, न्याय और विकास को समर्पित रहा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची राजनीति वही है, जो जनहित में हो और जिसमें सिद्धांतों से कभी समझौता न किया जाए।
आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर क्षेत्रवासियों द्वारा उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण किया जा रहा है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।












