प्रभात न्यूज़ 24:
“जहर की सप्लाई” का काला सच: गांव-गांव फैला अवैध शराब का साम्राज्य, दावों के ढेर में दबा एक पूरा जिला
बलौदाबाजार | लवन | कसडोल
बलौदाबाजार जिले के लवन और कसडोल क्षेत्र में अवैध शराब का कारोबार अब किसी छुपे हुए अपराध की तरह नहीं, बल्कि एक खुले “सिस्टम” की तरह चल रहा है। वर्षों से जारी यह धंधा आज एक संगठित सिंडिकेट में बदल चुका है—जहां सप्लाई, वितरण और संरक्षण—तीनों स्तर पर एक पूरा नेटवर्क सक्रिय है। प्रशासन के दावे लगातार होते रहे, कार्रवाई के आंकड़े भी सामने आते रहे, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि गांव-गांव में “जहर” की यह सप्लाई बिना किसी डर के जारी है।
गांव-गांव जहर: जहां जागरूकता नहीं, वहां माफिया का राज
इन क्षेत्रों के अधिकांश गांवों में अवैध शराब की उपलब्धता इतनी आसान हो चुकी है कि यह अब दैनिक जीवन का हिस्सा बन गई है। केवल वही गांव इस जाल से बच पाए हैं जहां—
महिलाओं ने संगठित होकर विरोध किया
सरपंच और स्थानीय नेतृत्व ने खुलकर मोर्चा लिया
जनता ने लगातार शिकायत और संघर्ष किया
लेकिन इन उदाहरणों के पीछे भी लंबी लड़ाई, सामाजिक तनाव और कई बार टकराव की कहानी छिपी है। जहां विरोध कमजोर पड़ा, वहां माफिया ने तुरंत अपनी जड़ें जमा लीं।
सप्लाई चेन का रहस्य: आखिर शराब आती कहां से है?
सबसे बड़ा और अनुत्तरित सवाल यही है—
इतनी बड़ी मात्रा में अवैध शराब का स्रोत क्या है?
संभावित पहलू जिन पर सवाल खड़े हो रहे हैं—
स्थानीय स्तर पर अवैध निर्माण (महुआ/हैंडमेड शराब)
लाइसेंसी दुकानों से “डायवर्जन” (कानूनी शराब का अवैध बाजार में जाना)
परिवहन में मिलीभगत और निगरानी की कमी
अगर इतनी बड़ी सप्लाई लगातार पहुंच रही है, तो साफ है कि यह कोई छोटे स्तर का खेल नहीं, बल्कि बड़े नेटवर्क का संकेत है।
कार्रवाई या औपचारिकता? छोटे मछलियां पकड़ी, बड़े शिकार गायब
स्थानीय लोगों का आरोप है कि—
कार्रवाई अक्सर केवल छोटे विक्रेताओं तक सीमित रहती है
बड़ी खेप और सप्लायर शायद ही कभी पकड़े जाते हैं
कई बार कार्रवाई “दिखावे” तक सीमित रह जाती है
यह स्थिति इस सवाल को और मजबूत करती है कि क्या प्रशासन असली जड़ तक पहुंचने में असफल है, या फिर कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर ही कमजोरी (या मिलीभगत) मौजूद है?
सामाजिक असर: टूटते परिवार, बढ़ता अपराध
अवैध शराब का यह नेटवर्क केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि समाज के लिए गंभीर खतरा बन चुका है—
गरीब और मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवादों में वृद्धि
युवाओं में नशे की बढ़ती लत
स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव (जहरीली शराब से मौत का खतरा)
कई गांवों में महिलाओं ने खुद सामने आकर विरोध किया, क्योंकि सबसे ज्यादा मार परिवार पर ही पड़ रही है।
प्रशासनिक दावे बनाम हकीकत
हर कुछ समय में कार्रवाई, जब्ती और छापेमारी के आंकड़े सामने आते हैं, लेकिन सवाल यह है—
???? अगर कार्रवाई प्रभावी है, तो फिर यह कारोबार खत्म क्यों नहीं हो रहा?
???? क्यों हर गांव में फिर से वही स्थिति बन जाती है?
???? क्या कोई दीर्घकालिक रणनीति लागू की गई है?
राजनीति और संरक्षण का साया?
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि—
कुछ प्रभावशाली लोगों का संरक्षण इस कारोबार को मजबूती देता है
चुनावी समय में इस नेटवर्क का इस्तेमाल भी होता है
शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े करता है
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन लगातार उठते ये सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता पर दबाव जरूर बनाते हैं।
जनता की स्पष्ट मांग: जड़ पर वार जरूरी
अब जनता की मांग सिर्फ छापेमारी नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की है—
✔️ सप्लाई के स्रोत की पहचान कर उस पर पूर्ण रोक
✔️ पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष और गहन जांच
✔️ दोषियों पर सख्त और उदाहरणात्मक कार्रवाई
✔️ गांव स्तर पर निगरानी समितियों को मजबूत करना
✔️ महिलाओं और जागरूक नागरिकों को सुरक्षा और समर्थन
निष्कर्ष: कब टूटेगा यह “जहर का नेटवर्क”?
बलौदाबाजार, लवन और कसडोल क्षेत्र में अवैध शराब का यह जाल केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक संकट बन चुका है। जब तक सप्लाई चेन की जड़ नहीं काटी जाती, तब तक यह “जहर” गांव-गांव फैलता रहेगा।
अब वक्त है निर्णायक कार्रवाई का—
क्या प्रशासन इस नेटवर्क की जड़ तक पहुंचकर इसे खत्म करेगा,
या फिर यह मुद्दा भी केवल कागजों और दावों में ही सीमित रह जाएगा?
जवाब का इंतजार पूरे जिले को है…












