प्रभात न्यूज़ 24:
तालाब गहरीकरण की आड़ में मुरूम का कारोबार! प्रशासन की बड़ी कार्रवाई के बाद गायब हुए जब्त वाहन, उठे कई सवाल
बलौदाबाजार/खिलोरा। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के सिमगा तहसील अंतर्गत ग्राम खिलोरा में तालाब गहरीकरण के नाम पर कथित रूप से चल रहे मुरूम के व्यवसायीकरण पर आखिरकार प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए दो चैन माउंटिंग वाहनों को जब्त किया है। ग्रामीणों और पत्रकारों द्वारा लगातार उठाई जा रही शिकायतों के बाद राजस्व विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई की, लेकिन कार्रवाई के कुछ ही घंटों बाद जब्त वाहनों के मौके से गायब हो जाने की सूचना ने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है।
तालाब गहरीकरण या मुरूम उत्खनन?
ग्राम खिलोरा के निस्तारी तालाब में पिछले कुछ समय से बड़े पैमाने पर खुदाई कार्य किया जा रहा था।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि तालाब गहरीकरण के नाम पर भारी मात्रा में मुरूम निकाली जा रही थी और उसका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था। ग्रामीणों का कहना है कि यदि उद्देश्य केवल जल संरक्षण और तालाब का विकास होता, तो उत्खनित सामग्री का उपयोग सीमित स्तर पर होता, लेकिन यहां लगातार मशीनों की आवाजाही और मुरूम परिवहन की गतिविधियां देखी जा रही थीं।
ग्रामीणों के अनुसार, तालाब विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा था, जिससे शासन की मंशा और वास्तविक कार्यप्रणाली के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा था।
शिकायतों के बाद हरकत में आया प्रशासन
मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों और छत्तीसगढ़ मीडिया एसोसिएशन से जुड़े पत्रकारों ने प्रशासन तक शिकायत पहुंचाई। शिकायतों के बाद तहसीलदार सिमगा के निर्देश पर राजस्व विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पूरे क्षेत्र का निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान उत्खनन कार्य में लगी दो चैन माउंटिंग मशीनों को जब्त कर लिया गया। मौके पर पंचनामा तैयार किया गया तथा दोनों वाहनों पर विधिवत जब्ती आदेश की नोटशीट चस्पा की गई। प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत वाहनों को थाना हथबंद के सुपुर्द किए जाने की तैयारी भी की जा रही थी।
जब्त वाहन कैसे हुए गायब?
कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब देर रात यह जानकारी सामने आई कि जब्त किए गए दोनों वाहन मौके से हटा लिए गए हैं। यदि यह तथ्य जांच में सही साबित होता है, तो यह केवल राजस्व नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना का भी गंभीर मामला बन सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब किसी वाहन को विधिवत जब्त कर उस पर आदेश चस्पा कर दिया गया था, तो फिर वह वाहन प्रशासन की निगरानी से बाहर कैसे चला गया? क्या सुरक्षा व्यवस्था में चूक हुई या फिर किसी स्तर पर लापरवाही बरती गई? ऐसे कई सवाल अब प्रशासन के सामने खड़े हो गए हैं।
ग्रामीणों में आक्रोश, निष्पक्ष जांच की मांग
मामले के सामने आने के बाद ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ गई है। उनका कहना है कि यदि अवैध उत्खनन के मामलों में कार्रवाई के बाद भी जब्त वाहन आसानी से हटाए जा सकते हैं, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े होते हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि तालाब गहरीकरण की अनुमति किन शर्तों पर दी गई थी, कितनी मात्रा में खुदाई की स्वीकृति थी और निकाली गई मुरूम का उपयोग कहां किया गया। साथ ही जब्त वाहनों को हटाए जाने के मामले में जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाए।
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर उठे प्रश्न
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण और तालाब गहरीकरण जैसी योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट दूर करने के उद्देश्य से संचालित की जाती हैं। लेकिन यदि इन योजनाओं की आड़ में खनिज संपदा का व्यावसायिक दोहन होने लगे, तो इसका सीधा नुकसान पर्यावरण और शासन की योजनाओं की विश्वसनीयता दोनों को होता है।
ग्राम खिलोरा का मामला अब केवल एक तालाब तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर रहा है कि विकास कार्यों के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
जांच के बाद सामने आएगी पूरी तस्वीर
फिलहाल प्रशासन द्वारा पूरे मामले की जांच जारी होने की बात कही जा रही है। अब क्षेत्रवासियों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जब्त वाहनों के गायब होने के मामले में प्रशासन क्या कदम उठाता है और कथित अवैध मुरूम उत्खनन के पीछे जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई की जाती है।
यदि जांच में शिकायतें सही पाई जाती हैं, तो यह मामला केवल अवैध उत्खनन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना और राजस्व नियमों के उल्लंघन जैसे गंभीर पहलुओं को भी उजागर कर सकता है।
फिलहाल ग्राम खिलोरा का यह मामला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग प्रशासन की अगली कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं।











