प्रभात न्यूज़ 24:
झीरम घाटी कांड की अगली सुनवाई 10 अगस्त को, 17 साल बाद सच सामने आने की उम्मीद; पूरे छत्तीसगढ़ की निगाहें न्यायिक प्रक्रिया पर
25 मई 2013 को नक्सली हमले में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं समेत सुरक्षाकर्मियों ने गंवाई थी जान, अब फिर तेज हुई झीरम कांड की चर्चा
बलौदाबाजार।
छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे दर्दनाक और चर्चित राजनीतिक घटनाओं में शामिल झीरम घाटी नक्सली हमला एक बार फिर सुर्खियों में है। इस मामले से जुड़ी अगली सुनवाई 10 अगस्त को होने जा रही है। सुनवाई की तारीख नजदीक आते ही प्रदेशभर में इस बात को लेकर चर्चा तेज हो गई है कि आखिर झीरम घाटी हमले के पीछे की पूरी सच्चाई क्या थी और इस भयावह हमले के वास्तविक षड्यंत्रकारियों तक जांच कब पहुंचेगी।
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, बस्तर के लोकप्रिय आदिवासी नेता एवं पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा सहित कई कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी। इस हमले ने न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
करीब एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी झीरम घाटी की घटना को लेकर कई सवाल आज भी राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। यही वजह है कि 10 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर छत्तीसगढ़ सहित देशभर की निगाहें टिकी होने की बात कही जा रही है।
परिवर्तन यात्रा पर हुआ था भीषण हमला
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा बस्तर क्षेत्र से गुजर रही थी। इसी दौरान झीरम घाटी के घने जंगलों में नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले को निशाना बनाया। पहले सड़क पर अवरोध और उसके बाद चारों ओर से गोलीबारी ने पूरे इलाके को दहला दिया।
हमले में कांग्रेस के कई शीर्ष नेता मारे गए। नंद कुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेताओं की हत्या ने प्रदेश की राजनीति को गहरा आघात पहुंचाया। बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी और कांग्रेस कार्यकर्ता भी इस हमले में शहीद हुए।
झीरम घाटी की घटना को छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे काले अध्याय के रूप में देखा जाता है, जिसकी टीस आज भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और शहीद परिवारों के बीच महसूस की जाती है।
आज भी उठ रहे हैं कई सवाल
झीरम घाटी हमले के बाद नक्सली हमले की जिम्मेदारी और हमले के प्रत्यक्ष घटनाक्रम को लेकर जांच एजेंसियों ने अलग-अलग स्तर पर जांच की। नक्सली हिंसा की इस बड़ी घटना के पीछे कौन लोग थे, हमले की योजना किस स्तर पर बनी, सुरक्षा व्यवस्था में क्या कमियां थीं और क्या हमले से पहले किसी प्रकार की सूचना उपलब्ध थी—इन जैसे कई सवालों को लेकर वर्षों से चर्चा होती रही है।
कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक वर्ग लगातार यह मांग उठाता रहा है कि झीरम घाटी हमले की संपूर्ण सच्चाई सामने आनी चाहिए और यदि किसी राजनीतिक या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका जांच में सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
हालांकि, इस मामले में किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की भूमिका को लेकर लगाए जाने वाले आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच अथवा न्यायिक प्रक्रिया से होना आवश्यक है।
10 अगस्त की सुनवाई क्यों है महत्वपूर्ण?
आगामी 10 अगस्त की सुनवाई को लेकर प्रदेश में राजनीतिक हलकों से लेकर आम लोगों तक चर्चा तेज है। कांग्रेस कार्यकर्ता खिलावन जायसवाल द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि झीरम घाटी मामले की सुनवाई को लेकर पूरे छत्तीसगढ़ की नजरें 10 अगस्त पर टिकी हुई हैं।
जायसवाल का कहना है कि झीरम घाटी की घटना को वर्षों बीत जाने के बावजूद आम लोगों के मन में यह सवाल बना हुआ है कि इस हमले की पूरी सच्चाई आखिर कब सामने आएगी।
उन्होंने कहा कि झीरम घाटी केवल एक राजनीतिक हमला नहीं था, बल्कि इस घटना ने छत्तीसगढ़ की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को लंबे समय तक प्रभावित किया। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की एक साथ हुई शहादत ने प्रदेश को गहरे सदमे में डाल दिया था।
घटना के बाद देश के शीर्ष नेतृत्व ने जताया था शोक
झीरम घाटी हमले की खबर सामने आने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित राष्ट्रीय स्तर के कई नेताओं ने छत्तीसगढ़ पहुंचकर घटना पर शोक व्यक्त किया था।
देशभर में इस हमले की व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। राजनीतिक दलों के नेताओं ने नक्सली हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की थी।
यह हमला उस समय हुआ था जब छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों की तैयारियां चल रही थीं और कांग्रेस परिवर्तन यात्रा के माध्यम से प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक अभियान चला रही थी।
महेंद्र कर्मा की शहादत भी झीरम से जुड़ी सबसे बड़ी त्रासदियों में
झीरम घाटी हमले में बस्तर के लोकप्रिय नेता महेंद्र कर्मा की शहादत ने पूरे बस्तर को झकझोर दिया था। नक्सलवाद के खिलाफ उनके मुखर राजनीतिक रुख के कारण वे लंबे समय से नक्सलियों के निशाने पर बताए जाते रहे थे।
महेंद्र कर्मा की हत्या को बस्तर की राजनीति में एक बड़ी क्षति माना गया। इसी हमले में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल भी गंभीर रूप से प्रभावित हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
कांग्रेस के लिए यह घटना संगठन और नेतृत्व के स्तर पर सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बन गई।
17 साल वाली बात पर भी ध्यान जरूरी
प्रेस विज्ञप्ति में झीरम घटना को करीब 17 वर्ष पुरानी घटना बताया गया है, लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार हमला 25 मई 2013 को हुआ था। इसलिए अगस्त 2026 में इस घटना को लगभग 13 वर्ष हुए हैं, 17 वर्ष नहीं। खबर में तथ्यात्मक शुद्धता बनाए रखने के लिए इस अंतर को स्पष्ट करना जरूरी है।
फिर भी, घटना को एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इससे जुड़े कई सवालों का सार्वजनिक और राजनीतिक महत्व बना हुआ है।
कांग्रेस ने कहा—सच्चाई सामने आना जरूरी
कांग्रेस कार्यकर्ता खिलावन जायसवाल ने कहा कि झीरम घाटी में शहीद हुए नेताओं और सुरक्षाकर्मियों के परिवारों को न्याय मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि घटना के पीछे की पूरी सच्चाई सामने आना केवल कांग्रेस की मांग नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास से जुड़ा विषय है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि इतनी बड़ी घटना कैसे हुई, सुरक्षा व्यवस्था में क्या कमियां थीं और हमले से जुड़े सभी पहलुओं की जांच किस निष्कर्ष तक पहुंची।
जायसवाल ने कहा कि 10 अगस्त की सुनवाई से लोगों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं और उन्हें विश्वास है कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से झीरम घाटी की घटना से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों पर स्थिति और स्पष्ट होगी।
शहीदों के परिवारों को अब भी अंतिम जवाब का इंतजार
झीरम घाटी हमले में जान गंवाने वाले नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों के परिवारों के लिए यह घटना आज भी एक गहरा जख्म है। वर्षों गुजरने के बाद भी कई परिवार अपने प्रियजनों को याद करते हुए उस दिन को नहीं भूल पाए हैं।
ऐसे में झीरम घाटी से जुड़ी हर सुनवाई उनके लिए सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस सवाल के जवाब की उम्मीद भी है कि उनके परिवार के सदस्य किन परिस्थितियों में शहीद हुए और इस पूरी घटना की अंतिम सच्चाई क्या थी।
प्रदेश की राजनीति में फिर गरमा सकता है मुद्दा
10 अगस्त की सुनवाई से पहले झीरम घाटी का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस लगातार इस घटना की पूरी जांच और सच्चाई सामने लाने की मांग करती रही है।
दूसरी ओर, इस मामले से जुड़े किसी भी राजनीतिक आरोप या दावे को अंतिम सत्य मानने के बजाय न्यायिक एवं जांच प्रक्रिया के निष्कर्षों के आधार पर ही देखा जाना आवश्यक है।
अब सबकी निगाहें 10 अगस्त की सुनवाई पर हैं। देखना होगा कि इस सुनवाई में क्या महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं और झीरम घाटी मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।
झीरम घाटी आज भी एक सवाल है—जिसका पूरा जवाब छत्तीसगढ़ मांग रहा है
13 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी झीरम घाटी की घटना छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में एक ऐसा अध्याय है, जिसे लोग भूल नहीं पाए हैं। शहीद नेताओं और सुरक्षाकर्मियों की स्मृति के साथ यह सवाल आज भी कायम है कि इस हमले की पूरी सच्चाई कब सामने आएगी।
10 अगस्त की अगली सुनवाई इसी उम्मीद के साथ महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और झीरम घाटी से जुड़े अनुत्तरित सवालों पर स्थिति और स्पष्ट होगी।
















