प्रभात न्यूज़ 24:
नियमों की अनदेखी या प्रक्रिया में चूक? बिना स्पष्ट स्वीकृति बने शराब दुकान भवन के अब मूल्यांकन की तैयारी, उठे गंभीर सवाल
ग्राम पंचायत हथबंध में पंचायत मद से निर्माण का मामला चर्चा में, शिकायतकर्ता ने मूल्यांकन से पहले स्टीमेट, तकनीकी-प्रशासकीय स्वीकृति और कार्यादेश सहित पूरे अभिलेखों की जांच की मांग की
बलौदाबाजार/हथबंध।
ग्राम पंचायत हथबंध में पंचायत मद से कराए गए बताए जा रहे शराब दुकान भवन निर्माण का मामला अब निर्माण के बाद होने वाले मूल्यांकन की प्रक्रिया तक पहुंच गया है। निर्माण कार्य को लेकर शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए सवालों के बाद अब मुख्य मुद्दा यह है कि आखिर भवन निर्माण किस स्वीकृति, किस मद और किस प्रक्रिया के तहत कराया गया तथा निर्माण शुरू होने से पहले आवश्यक दस्तावेज एवं तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी की गई थीं या नहीं।
शिकायतकर्ता का कहना है कि भवन निर्माण के दौरान ही संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी देकर निर्माण की प्रक्रिया और वैधानिकता की जांच कराने की मांग की गई थी। इसके बावजूद निर्माण कार्य आगे बढ़ता रहा। अब जब निर्मित भवन के मूल्यांकन की तैयारी की बात सामने आ रही है, तो शिकायतकर्ता और ग्रामीणों की ओर से मांग उठाई जा रही है कि मूल्यांकन और भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले निर्माण से संबंधित सभी मूल अभिलेखों की जांच की जाए।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि निर्माण कार्य के लिए विधिवत प्राक्कलन यानी स्टीमेट, तकनीकी स्वीकृति, प्रशासकीय स्वीकृति और कार्यादेश उपलब्ध थे, तो उनके आधार पर निर्माण की पूरी प्रक्रिया को अभिलेखों में स्पष्ट किया जाए। वहीं यदि ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि निर्माण किस आधार पर शुरू हुआ और उसके लिए राशि की व्यवस्था किस पंचायत मद से की गई।
12 जनवरी 2026 को कार्यादेश को लेकर सामने आई थी महत्वपूर्ण जानकारी
शिकायतकर्ता के अनुसार, मामले की जानकारी जनपद पंचायत के अधिकारियों को भी दी गई थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि 12 जनवरी 2026 को कार्यालय स्तर से यह जानकारी दी गई थी कि उक्त निर्माण के लिए कोई कार्यादेश जारी नहीं किया गया है। साथ ही निर्माण कार्य किस मद से कराया जा रहा है और उसका स्टीमेट क्या है, इसकी जानकारी भी कार्यालय स्तर पर उपलब्ध नहीं होने की बात बताई गई थी।
यदि शिकायतकर्ता द्वारा बताई गई यह जानकारी संबंधित कार्यालय के अभिलेखों से पुष्ट होती है, तो निर्माण की पूरी प्रक्रिया की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि किसी भी सार्वजनिक धन से कराए जाने वाले निर्माण में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि कार्य की स्वीकृति किस स्तर से हुई, लागत कितनी निर्धारित की गई, तकनीकी परीक्षण किसने किया, कार्य किसे सौंपा गया और भुगतान किस आधार पर किया गया।
यही कारण है कि अब शिकायतकर्ता की मांग है कि केवल तैयार भवन का मूल्यांकन करने के बजाय पहले उसके निर्माण से जुड़े दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला सामने लाई जाए।
मूल्यांकन से पहले उठे कई सवाल
निर्माण पूरा होने के बाद किसी भवन का मूल्यांकन कराया जाना अपने आप में सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन हथबंध के इस मामले में सवाल मूल्यांकन की प्रक्रिया से अधिक निर्माण की स्वीकृति और भुगतान के आधार को लेकर उठ रहे हैं।
शिकायतकर्ता और ग्रामीणों की मांग है कि मूल्यांकन से पहले निम्न अभिलेखों की जांच की जाए—
निर्माण कार्य का स्वीकृत प्राक्कलन यानी स्टीमेट।
तकनीकी स्वीकृति से संबंधित दस्तावेज।
प्रशासकीय स्वीकृति की प्रति।
विधिवत जारी कार्यादेश।
ग्राम पंचायत का प्रस्ताव एवं बैठक कार्यवाही।
कार्य प्रारंभ करने से संबंधित आदेश अथवा अभिलेख।
माप पुस्तिका (एमबी)।
निर्माण में उपयोग की गई सामग्री से संबंधित विवरण।
बिल एवं वाउचर।
भुगतान से संबंधित अभिलेख।
पंचायत की कैशबुक।
बैंक खाते से किए गए भुगतान का विवरण।
संबंधित पंचायत मद एवं उसकी उपलब्ध राशि का विवरण।
निर्माण कार्य से संबंधित अन्य पत्राचार एवं निरीक्षण रिपोर्ट।
ग्रामीणों का कहना है कि इन दस्तावेजों की जांच होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भवन निर्माण किस प्रक्रिया के तहत कराया गया और वास्तविक रूप से कितनी राशि खर्च हुई।
50 हजार रुपये से अधिक के निर्माण को लेकर भी उठाए जा रहे सवाल
शिकायतकर्ता की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि पंचायत स्तर पर निर्धारित वित्तीय एवं तकनीकी नियमों के अनुसार निर्धारित सीमा से अधिक लागत वाले निर्माण कार्यों में आवश्यक तकनीकी और प्रशासकीय स्वीकृतियां महत्वपूर्ण होती हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि 50 हजार रुपये से अधिक लागत वाले निर्माण कार्य के लिए आवश्यक स्वीकृतियों के बिना कार्य शुरू नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि इस बिंदु पर अंतिम स्थिति संबंधित विभाग के लागू नियमों, आदेशों और मामले के वास्तविक अभिलेखों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। इसलिए प्रशासन से मांग की गई है कि संबंधित निर्माण की अनुमानित एवं वास्तविक लागत तथा उस समय लागू नियमों के आधार पर पूरे मामले की जांच कराई जाए।
यदि दस्तावेजों में आवश्यक स्वीकृतियां उपलब्ध हैं तो उन्हें सार्वजनिक जांच के लिए सामने लाकर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं यदि कोई स्वीकृति या कार्यादेश उपलब्ध नहीं है, तो यह पता लगाया जाना जरूरी होगा कि निर्माण कार्य किस अधिकार और किस वित्तीय प्रावधान के तहत कराया गया।
सचिव और सरपंच की भूमिका को लेकर भी जांच की मांग
शिकायतकर्ता की ओर से पंचायत के सचिव और सरपंच से जुड़े स्तर पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि निर्माण कार्य में निर्धारित कागजी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और पंचायत स्तर पर कुछ कार्यों को निजी ठेकेदारों के माध्यम से कराए जाने की बात भी कही गई है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी या कथित अनियमितता को केवल शिकायत अथवा आरोप के आधार पर प्रमाणित नहीं माना जा सकता। इन आरोपों की पुष्टि पंचायत के प्रस्ताव, कार्यादेश, भुगतान रिकॉर्ड, माप पुस्तिका, कैशबुक तथा संबंधित अधिकारियों के दस्तावेजों से ही हो सकती है।
इसी वजह से मामले में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के बजाय रिकॉर्ड आधारित जांच की मांग ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या पंचायत को निर्माण की पूरी जानकारी थी?
मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि निर्माण कार्य किस स्तर पर प्रस्तावित हुआ और पंचायत के आधिकारिक रिकॉर्ड में उसकी प्रविष्टि किस रूप में की गई।
यदि पंचायत बैठक में निर्माण का प्रस्ताव पारित हुआ था, तो उसकी प्रमाणित प्रति सामने आनी चाहिए। यदि कार्य पंचायत मद से हुआ, तो संबंधित मद का नाम और उसमें उपलब्ध राशि का विवरण भी स्पष्ट होना चाहिए। यदि निर्माण किसी अन्य योजना या विभागीय मद से कराया गया, तो उस विभाग की स्वीकृति और राशि का स्रोत भी जांच के दायरे में आना चाहिए।
इसी तरह यह भी देखा जाना आवश्यक है कि कार्य की अनुमानित लागत कितनी थी और निर्माण पूरा होने के बाद मूल्यांकन में कितनी राशि निर्धारित की जा रही है।
माप पुस्तिका बताएगी वास्तविक निर्माण कितना हुआ
निर्माण कार्यों में माप पुस्तिका यानी एमबी महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है। ग्रामीणों की मांग है कि भवन का मूल्यांकन करते समय मौके पर मौजूद निर्माण और माप पुस्तिका में दर्ज मात्रा का मिलान कराया जाए।
मसलन भवन की लंबाई-चौड़ाई, नींव, दीवार, छत, दरवाजे-खिड़की, फर्श, विद्युत व्यवस्था और अन्य निर्माण मदों में कितना कार्य किया गया, उसका भौतिक सत्यापन किया जाए। इसके बाद ही यह तुलना संभव होगी कि कागजों में दर्ज कार्य और मौके पर वास्तविक निर्माण में कितना सामंजस्य है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि स्थल निरीक्षण और दस्तावेजी रिकॉर्ड का मिलान कराया जाता है तो निर्माण की वास्तविक लागत को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब भी सामने आ सकता है।
भुगतान हुआ तो किस आधार पर हुआ?
इस मामले में एक बड़ा सवाल संभावित भुगतान को लेकर भी है। यदि पंचायत मद से निर्माण कराया गया है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्माण के लिए राशि किस खाते या मद से निकाली गई और भुगतान किस व्यक्ति, संस्था या एजेंसी को किया गया।
यदि भुगतान हो चुका है तो उसके लिए संबंधित बिल, वाउचर, स्वीकृति, माप पुस्तिका और भुगतान आदेश की जांच की जानी चाहिए। यदि अभी भुगतान नहीं हुआ है और केवल मूल्यांकन की प्रक्रिया चल रही है, तो मूल्यांकन से पहले सभी आवश्यक दस्तावेजों की जांच कराना और भी जरूरी हो जाता है।
यही वजह है कि शिकायतकर्ता ने मांग की है कि मूल्यांकन के साथ-साथ वित्तीय अभिलेखों का भी परीक्षण किया जाए, ताकि सरकारी धन के उपयोग को लेकर पूरी स्थिति स्पष्ट हो सके।
ग्रामीणों ने की निष्पक्ष स्थल जांच की मांग
ग्रामीणों की ओर से मांग की गई है कि संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर भवन का भौतिक निरीक्षण करें। निरीक्षण के दौरान निर्माण की वास्तविक मात्रा, उपयोग की गई सामग्री, भवन का क्षेत्रफल और वर्तमान स्थिति का रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
इसके साथ ही निर्माण स्थल की स्थिति का पंचनामा तैयार कर उपलब्ध दस्तावेजों से उसका मिलान कराने की मांग भी की गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि दस्तावेज और मौके की स्थिति में अंतर मिलता है, तो उसके कारणों की जांच की जानी चाहिए। वहीं यदि निर्माण पूरी तरह नियमों और स्वीकृत प्रक्रिया के अनुरूप पाया जाता है, तो प्रशासन द्वारा दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट किए जाने से सभी सवालों का समाधान हो सकता है।
शिकायत के बाद अब प्रशासन की जांच पर टिकी नजर
हथबंध के इस मामले में अब सबसे ज्यादा नजर प्रशासनिक जांच की दिशा पर है। सवाल यह नहीं है कि केवल भवन बना या नहीं बना, बल्कि सवाल यह है कि भवन निर्माण की पूरी प्रक्रिया किस नियम और किस स्वीकृति के आधार पर पूरी हुई।
क्या निर्माण से पहले स्टीमेट तैयार हुआ था?
क्या तकनीकी स्वीकृति ली गई थी?
क्या प्रशासकीय स्वीकृति मौजूद थी?
क्या विधिवत कार्यादेश जारी हुआ था?
क्या ग्राम पंचायत की बैठक में प्रस्ताव पारित हुआ था?
किस पंचायत मद से राशि खर्च की गई?
क्या माप पुस्तिका में कार्य का विधिवत मापन दर्ज है?
और यदि भुगतान हुआ है तो किस दस्तावेज के आधार पर हुआ?
इन सभी सवालों का जवाब पंचायत और संबंधित विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।
जांच में अनियमितता मिली तो तय हो जिम्मेदारी
शिकायतकर्ता की मांग है कि यदि जांच में यह पाया जाता है कि निर्माण कार्य निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत कराया गया, आवश्यक स्वीकृतियां उपलब्ध नहीं थीं या सरकारी राशि के उपयोग में किसी प्रकार की वित्तीय अथवा प्रक्रियागत अनियमितता हुई है, तो संबंधित जिम्मेदारी तय करते हुए लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए।
वहीं यदि जांच में निर्माण कार्य नियमों के अनुरूप पाया जाता है, तो प्रशासन को संबंधित दस्तावेजों के आधार पर स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि शिकायत और आरोपों को लेकर बनी स्थिति समाप्त हो सके।
सवाल भवन से ज्यादा प्रक्रिया पर
हथबंध का यह मामला अब सिर्फ एक भवन के निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला पंचायत स्तर पर होने वाले सार्वजनिक निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, स्वीकृति प्रक्रिया, तकनीकी परीक्षण और सरकारी राशि के उपयोग से जुड़ा सवाल बन गया है।
सरकारी धन से बनने वाले किसी भी निर्माण की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, उतना ही आम जनता का विश्वास मजबूत होगा। इसलिए ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मामले में राजनीतिक या व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से अलग हटकर केवल दस्तावेज और मौके की वास्तविक स्थिति के आधार पर जांच की जाए।
अब देखना यह होगा कि संबंधित प्रशासनिक अधिकारी मूल्यांकन से पहले निर्माण से जुड़े मूल अभिलेखों की जांच कराते हैं या नहीं और यदि जांच होती है तो उसके निष्कर्षों में निर्माण कार्य की स्वीकृति, लागत, भुगतान और वास्तविक निर्माण की स्थिति को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं।
प्रभात न्यूज़ 24 की स्पष्टता
यह समाचार उपलब्ध शिकायत, उठाए गए सवालों और शिकायतकर्ता द्वारा बताए गए दस्तावेजी तथ्यों के आधार पर तैयार किया गया है। समाचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति, जनप्रतिनिधि, अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार अथवा संस्था पर व्यक्तिगत आरोप लगाना या किसी को दोषी ठहराना नहीं है। संबंधित व्यक्तियों/पक्षों का पक्ष सामने आने पर उसे भी समाचार में उचित स्थान दिया जाएगा। किसी भी आरोप की अंतिम पुष्टि सक्षम प्रशासनिक जांच, आधिकारिक अभिलेख अथवा न्यायिक प्रक्रिया से ही मानी जाएगी। समाचार का उद्देश्य जनहित में पारदर्शिता, जवाबदेही और सरकारी धन के उपयोग से संबंधित तथ्यों को सामने लाना है।











