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स्कूल में घुसकर प्राचार्य से अभद्रता के बाद अब प्रशासनिक पत्र पर उठे सवाल प्रभारी प्राचार्य ने सचिव स्कूल शिक्षा विभाग को भेजा आवेदन, बिना विधिवत जांच ‘कार्य अक्षमता’ लिखे जाने पर जताई गंभीर आपत्ति

देश / दुनिया 21 September 2026 (88)

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प्रभात न्यूज़ 24: 

स्कूल में घुसकर प्राचार्य से अभद्रता के बाद अब प्रशासनिक पत्र पर उठे सवाल


प्रभारी प्राचार्य ने सचिव स्कूल शिक्षा विभाग को भेजा आवेदन, बिना विधिवत जांच ‘कार्य अक्षमता’ लिखे जाने पर जताई गंभीर आपत्ति



बलौदाबाजार। 

पंडित चक्रपाणि शुक्ला शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बलौदाबाजार में स्कूल परिसर में प्रवेश कर प्रभारी प्राचार्य के साथ कथित अभद्र व्यवहार को लेकर उठे सवालों के बीच अब मामले ने एक नया प्रशासनिक मोड़ ले लिया है। प्रभारी प्राचार्य श्रीमती वंदनीय श्रीवास्तव ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को विस्तृत आवेदन भेजकर दिनांक 17 सितंबर 2026 को जारी किए गए “आश्वासन” पत्र में उनकी कार्यक्षमता को लेकर की गई टिप्पणी पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है।



प्राचार्य की ओर से भेजे गए आवेदन में मुख्य सवाल यह उठाया गया है कि यदि उनके विरुद्ध कोई शिकायत प्राप्त हुई थी, तो क्या उस शिकायत की विधिवत जांच की गई? क्या उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया? और क्या किसी सक्षम अधिकारी द्वारा जांच के बाद उनकी कार्यक्षमता को लेकर कोई निष्कर्ष दर्ज किया गया था?



आवेदन में कहा गया है कि संबंधित पत्र में उन्हें “कार्य अक्षमता के कारण” प्रभारी संस्था का प्रभार वरिष्ठ व्याख्याता को दिए जाने की बात कही गई है। प्राचार्य का कहना है कि पत्र में किसी जांच अधिकारी, जांच रिपोर्ट अथवा जांच के अंतिम निष्कर्ष का उल्लेख स्पष्ट रूप से सामने नहीं आता। ऐसे में बिना विधिवत जांच किसी शासकीय अधिकारी की कार्यक्षमता पर निष्कर्षात्मक टिप्पणी किए जाने का आधार स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।



शिकायत और दोषसिद्धि में अंतर का सवाल

प्राचार्य ने अपने आवेदन में प्रशासनिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण पहलू को सामने रखा है। उनका कहना है कि किसी कर्मचारी के विरुद्ध शिकायत प्राप्त होना अपने आप में उस कर्मचारी को दोषी या अक्षम सिद्ध नहीं करता। शिकायत की जांच, संबंधित पक्ष का पक्ष सुनना, तथ्यों का परीक्षण और सक्षम प्राधिकारी द्वारा निष्कर्ष—ये सभी प्रशासनिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरण हैं।

इसी आधार पर उन्होंने पूछा है कि यदि जांच हुई थी तो उसकी रिपोर्ट और निष्कर्ष क्या हैं तथा यदि जांच नहीं हुई थी तो फिर कार्य अक्षमता जैसी टिप्पणी किस आधार पर की गई?



“आश्वासन” पत्र में प्रतिकूल टिप्पणी पर भी आपत्ति

आवेदन में पत्र के शीर्षक “आश्वासन” को लेकर भी सवाल उठाया गया है। प्राचार्य की ओर से कहा गया है कि यदि किसी शिकायतकर्ता को यह आश्वासन दिया जाना था कि शिकायत की नियमानुसार जांच की जाएगी, तो प्रशासनिक पत्र में जांच की प्रक्रिया का उल्लेख किया जाना अपेक्षित था। इसके बजाय कार्य अक्षमता का उल्लेख किए जाने से उनकी सेवा-प्रतिष्ठा और व्यावसायिक सम्मान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है।

आवेदन में इसे केवल व्यक्तिगत विवाद के रूप में नहीं देखते हुए निष्पक्ष प्रशासन और शासकीय कर्मचारियों के सेवा-सम्मान से जुड़ा विषय बताया गया है।



आखिर किस अधिकार के तहत लिया गया निर्णय?

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संबंधित अधिकारी की अधिकारिता को लेकर उठाया गया सवाल है। प्रभारी प्राचार्य ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव से यह स्पष्ट कराने की मांग की है कि उन्हें प्रभारी पद से मुक्त करने तथा उनकी कार्यक्षमता के संबंध में टिप्पणी करने का अधिकार संबंधित अधिकारी को किस शासनादेश, सेवा नियम, विभागीय आदेश अथवा प्रत्यायोजित अधिकार के तहत प्राप्त था।

यदि ऐसा अधिकार प्राप्त था तो उसका आधार स्पष्ट किए जाने और यदि अधिकारिता का अभाव था तो उस स्थिति में पत्र जारी करने की प्रक्रिया की जांच किए जाने की मांग की गई है।



महिला अधिकारी की गरिमा का भी मुद्दा

आवेदन में महिला शासकीय अधिकारी की गरिमा और सेवा-सम्मान को भी प्रमुखता से उठाया गया है। प्राचार्य का कहना है कि किसी महिला अधिकारी के संबंध में बिना विधिवत जांच के कार्यक्षमता पर प्रतिकूल टिप्पणी का असर केवल कार्यालयीन व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे अधिकारी की व्यावसायिक प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान भी प्रभावित हो सकता है।

आवेदन में किसी विशेष संरक्षण की मांग के बजाय समान, पारदर्शी और निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाने की मांग की गई है।



बाहरी दबाव की चर्चा भी निष्पक्ष जांच की मांग

आवेदन में यह भी कहा गया है कि कार्रवाई के पीछे बाहरी व्यक्तियों के दबाव की चर्चा सामने आई है। हालांकि प्राचार्य ने इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से मांग की है कि यदि ऐसी किसी भूमिका की वास्तविकता है तो इसकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।

आवेदन में यह तर्क दिया गया है कि किसी भी शिकायत, सूचना या बाहरी हस्तक्षेप के आधार पर प्रशासन को स्वतंत्र रूप से तथ्यों की जांच करनी चाहिए और उसके बाद ही किसी शासकीय कर्मचारी के संबंध में प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज किया जाना चाहिए।



सचिव से नौ बिंदुओं पर कार्रवाई की मांग

प्रभारी प्राचार्य ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव से मामले की स्वतंत्र जांच सहित कुल नौ बिंदुओं पर कार्रवाई की मांग की है। इनमें 17 सितंबर को जारी पत्र की वैधानिकता, तथ्यात्मक आधार और अधिकारिता की जांच, शिकायत एवं जांच से संबंधित अभिलेखों का परीक्षण, कार्य अक्षमता संबंधी टिप्पणी के आधार की जांच, आवश्यकता होने पर पत्र को निरस्त अथवा वापस लेने, सेवा-प्रतिष्ठा की रक्षा तथा किसी वरिष्ठ एवं मामले से प्रत्यक्ष रूप से असंबंधित अधिकारी से जांच कराने की मांग शामिल है।

साथ ही जांच पूरी होने तक ऐसी किसी टिप्पणी या प्रचार-प्रसार से बचने का अनुरोध किया गया है, जिससे संबंधित अधिकारी की सेवा-प्रतिष्ठा प्रभावित हो।



कई वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा गया आवेदन

जानकारी के अनुसार आवेदन स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव, संचालक लोक शिक्षण संचालनालय, कलेक्टर बलौदाबाजार-भाटापारा, जिला शिक्षा अधिकारी सहित छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग और छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग को भी भेजा गया है।

अब पूरे मामले में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग शिकायत, प्रशासनिक पत्र और उसमें की गई टिप्पणी के संबंध में क्या अभिलेखीय स्थिति सामने रखता है तथा क्या मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाती है।



सवाल सिर्फ एक प्राचार्य का नहीं, व्यवस्था में भरोसे का है

यह पूरा घटनाक्रम एक व्यापक सवाल भी खड़ा करता है—क्या किसी शासकीय कर्मचारी के विरुद्ध शिकायत और उसके दोष सिद्ध होने के बीच की प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए? निश्चित रूप से शिकायतों की जांच आवश्यक है, लेकिन जांच की प्रक्रिया और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रशासनिक निष्पक्षता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

स्कूल जैसे संस्थान में विवाद की स्थिति और भी संवेदनशील हो जाती है, क्योंकि यहां प्रशासनिक निर्णयों का सीधा प्रभाव विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों पर पड़ता है।

ऐसे मामलों में जरूरी है कि व्यक्ति नहीं, तथ्य केंद्र में हों; आरोप नहीं, जांच केंद्र में हो और दबाव नहीं, नियम निर्णय का आधार बनें। इससे न केवल संबंधित अधिकारी की गरिमा सुरक्षित रहती है, बल्कि आम नागरिकों का प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा भी मजबूत होता है।

अब निगाहें स्कूल शिक्षा विभाग की आगामी कार्रवाई पर हैं कि इस मामले में शिकायत, प्रशासनिक पत्र और अधिकारिता से जुड़े सवालों का क्या निष्पक्ष समाधान सामने आता है।

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