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बवासीर का इलाज: आधुनिक चिकित्सा व आयुर्वेदिक पद्धति से राहत संभव
संवाददाता- विजय शंकर तिवारी
बलौदाबाजार।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बवासीर (Piles/Hemorrhoids) आज के समय में एक आम लेकिन गंभीर समस्या बन चुकी है। गलत जीवनशैली, अनियमित खानपान और लंबे समय तक बैठने की आदत इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं। उच्च स्तरीय डॉक्टरों की मानें तो इसका इलाज अंग्रेजी (एलोपैथिक) चिकित्सा व आयुर्वेदिक पद्धति—दोनों तरीकों से संभव है।
अंग्रेजी (एलोपैथिक) इलाज
विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआती अवस्था में बवासीर को दवाओं, सपोसिटरी और मलहम से नियंत्रित किया जा सकता है।
लैक्जेटिव दवाएं (Stool softener) कब्ज दूर करने में मदद करती हैं।
पेन रिलीवर दर्द और सूजन को कम करते हैं।
मलहम व क्रीम से जलन और खुजली में राहत मिलती है।
गंभीर मामलों में रबर बैंड लिगेशन, लेज़र सर्जरी या हेमोरॉयडेक्टॉमी जैसी शल्य चिकित्सा अपनाई जाती है।
आयुर्वेदिक इलाज
आयुर्वेद के अनुसार, बवासीर पित्त व वात दोष असंतुलन से होता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और जीवनशैली सुधार पर जोर दिया जाता है।
त्रिफला चूर्ण – कब्ज दूर कर पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है।
अर्शोघ्न वटी व कचनार गुग्गुलु – बवासीर की सूजन व दर्द कम करने में सहायक।
नीम, हरिद्रा व घृतकुमारी (एलोवेरा) – रक्त शुद्ध करने और घाव भरने में उपयोगी।
सिट्ज बाथ (गर्म पानी में बैठना) – गुदा क्षेत्र की सूजन व जलन में राहत देता है।
विशेषज्ञों की राय
डॉ. राजेश मिश्रा (गैस्ट्रो सर्जन) का कहना है कि—
“अगर शुरुआती लक्षण पर ही ध्यान दिया जाए तो सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। नियमित फाइबर युक्त आहार और पर्याप्त पानी से रोग पर काबू पाया जा सकता है।”
वहीं आयुर्वेदाचार्य डॉ. मनीषा वर्मा का कहना है कि—
“आयुर्वेद केवल लक्षण ही नहीं बल्कि रोग की जड़ पर काम करता है। जीवनशैली सुधार और पंचकर्म चिकित्सा बवासीर रोगियों के लिए दीर्घकालिक राहत देती है।”
सावधानी व रोकथाम
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोगी नियमित व्यायाम करें, तैलीय व मसालेदार भोजन से परहेज रखें, फाइबर युक्त भोजन जैसे फल-सब्जी व अनाज का सेवन करें तथा पानी पर्याप्त मात्रा में पिएं।















