प्रभात न्यूज़ 24:
पानी से भरे पुराने माइंस गड्ढे में फ्लाई ऐश डालने का मामला गरमाया, नियमों की अनदेखी के आरोप
ढाबाढिह-सोनबरसा जंगल क्षेत्र में राखड़ डंपिंग की शिकायत, कलेक्टर से लेकर पर्यावरण व खनिज विभाग तक जांच की मांग
बलौदाबाजार।
खजरी-ढाबाढिह क्षेत्र स्थित अनिमेष पावर प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश को ढाबाढिह से लगे सोनबरसा जंगल क्षेत्र में स्थित पुराने माइंस गड्ढे में डाले जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार जिस पुराने खदान गड्ढे में राखड़ डाला जा रहा है, उसमें पानी भरा हुआ है और यदि बिना आवश्यक अनुमति, तकनीकी प्रक्रिया तथा पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के सीधे पानी में फ्लाई ऐश डाली जा रही है, तो इससे भूजल, आसपास के वन क्षेत्र और जैव-विविधता पर संभावित प्रभाव की गंभीरता से जांच किया जाना जरूरी है।
हालांकि इस संबंध में यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि मौके पर राखड़ डालने की प्रक्रिया वास्तव में किन अनुमतियों, स्वीकृत माइंस प्लान और पर्यावरणीय शर्तों के तहत की जा रही है, इसकी आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभागों की जांच के बाद ही हो सकती है।
Ash Utilisation Notification 2021 में mine void में फ्लाई ऐश उपयोग की अनुमति, लेकिन शर्तों के साथ
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की Ash Utilisation Notification, 2021 (S.O. 5481(E), 31 दिसंबर 2021) में फ्लाई ऐश के पर्यावरण-अनुकूल उपयोग के विभिन्न तरीके निर्धारित किए गए हैं, जिनमें mine voids को भरना भी शामिल है। लेकिन इसी अधिसूचना के तहत खदानों में ash utilization के लिए निर्धारित प्रक्रिया और सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक है।
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अधिसूचना के Para B(3) के अनुसार 300 किलोमीटर के दायरे में आने वाली खदानों के संबंध में ash को mine void में backfilling अथवा external overburden के साथ मिलाने की व्यवस्था की गई है तथा कम से कम 25 प्रतिशत ash को weight-to-weight basis पर संबंधित सामग्री के साथ मिलाने का प्रावधान है। इसके अलावा यह कार्य DGMS, CPCB और IBM द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया जाना है।
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वहीं Para B(4) में mine closure plans में ash utilization को शामिल करने तथा संबंधित प्राधिकरण से mine plans की स्वीकृति की बात कही गई है। विभिन्न नियामक अनुमतियों में आवश्यक संशोधन/अनुमोदन की प्रक्रिया भी अधिसूचना में निर्धारित है।
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इसलिए बड़ा सवाल यह है कि ढाबाढिह-सोनबरसा क्षेत्र के जिस पुराने माइंस गड्ढे में राखड़ डाले जाने की बात सामने आ रही है, क्या उसके लिए स्वीकृत mine closure plan, संबंधित विभागों की अनुमति, पर्यावरणीय स्वीकृतियां और निर्धारित तकनीकी प्रक्रिया मौजूद है?
क्या पानी से भरे गड्ढे में सीधे राखड़ डालना सुरक्षित है?
यही इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पर्यावरणीय सवाल है।
Ash Utilisation Notification, 2021 में Thermal Power Plants को ash की loading, unloading, transportation, storage और disposal environmentally sound manner में करने तथा वायु एवं जल प्रदूषण को रोकने के लिए सभी आवश्यक सावधानियां बरतने का निर्देश दिया गया है।
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ऐसे में यदि मौके पर वास्तव में पानी से भरे गड्ढे में बिना पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के फ्लाई ऐश डाली जा रही है, तो प्रशासन और पर्यावरण विभाग द्वारा यह जांच किया जाना आवश्यक है कि—
क्या गड्ढे की वैज्ञानिक जांच की गई है?
क्या वहां groundwater table का अध्ययन हुआ है?
क्या गड्ढे की lining अथवा containment व्यवस्था है?
क्या फ्लाई ऐश और पानी के संपर्क को लेकर तकनीकी परीक्षण कराया गया है?
क्या आसपास के बोरवेल के पानी की गुणवत्ता की जांच हुई है?
क्या राखड़ में heavy metals की जांच कराई गई है?
क्या स्थल को विधिवत स्वीकृत mine void के रूप में चिन्हित किया गया है?
क्या ash filling के लिए आवश्यक mine closure plan एवं अन्य अनुमतियां उपलब्ध हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या मौके पर 25 प्रतिशत ash mixing सहित अधिसूचना में निर्धारित प्रक्रिया का पालन हो रहा है?
सोनबरसा जंगल और ग्रामीणों के बोरवेल को लेकर चिंता
ढाबाढिह से लगे सोनबरसा जंगल क्षेत्र में वनस्पति और वन्यजीवों की मौजूदगी को देखते हुए स्थानीय स्तर पर यह चिंता भी व्यक्त की जा रही है कि यदि राखड़ का पानी आसपास की जमीन या भूजल तक पहुंचता है तो इसका पर्यावरणीय प्रभाव क्या होगा।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि राखड़ के कारण किसी वन्यजीव या पौधे को नुकसान पहुंचा है। लेकिन संभावित जोखिम की वैज्ञानिक जांच न होना भी अपने आप में गंभीर प्रशासनिक प्रश्न खड़ा करता है।
इसलिए मौके से मिट्टी, राखड़, सतही जल और आसपास के बोरवेल के पानी के नमूने लेकर अधिकृत प्रयोगशाला से परीक्षण कराया जाना जनहित में आवश्यक दिखाई देता है।
Water Act के तहत भी उठते हैं सवाल
Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974 का उद्देश्य जल प्रदूषण को रोकना और जल की गुणवत्ता को बनाए रखना है। अधिनियम में जल स्रोतों/कुओं तथा भूमि पर प्रदूषणकारी पदार्थों के निपटान और नए discharge से संबंधित प्रावधान हैं।
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इसलिए यदि जांच में यह पाया जाता है कि किसी औद्योगिक गतिविधि के कारण प्रदूषणकारी पदार्थ जल या भूजल तक पहुंचने की संभावना पैदा हो रही है, तो छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा संबंधित अनुमति, Consent और पर्यावरणीय शर्तों के अनुपालन की जांच किया जाना आवश्यक है।
निजी जमीन होने पर भी खत्म नहीं हो जाती पर्यावरणीय जिम्मेदारी
यदि संबंधित पुराना माइंस गड्ढा निजी भूमि पर है, तब भी केवल निजी भूमि होने के आधार पर पर्यावरणीय नियमों से छूट नहीं मानी जा सकती। भूमि का वास्तविक उपयोग, पूर्व खनन गतिविधि, खदान की स्थिति, पर्यावरणीय स्वीकृति, CECB की Consent तथा अन्य लागू अनुमतियों की स्थिति की जांच आवश्यक है।
यदि क्षेत्र वन भूमि या विधिक रूप से संरक्षित वन क्षेत्र की श्रेणी में आता है, तो लागू वन एवं पर्यावरण कानूनों के तहत अलग से अनुमति और अनुपालन की भी जांच जरूरी होगी।
पूर्व में किसानों की जमीन पर राखड़ डालने की शिकायत का क्या हुआ?
बताया जाता है कि इससे पहले ग्राम पंचायत ढाबाढिह क्षेत्र के कुछ किसानों की निजी जमीन पर भी राखड़ डाले जाने को लेकर शिकायतें कलेक्टर, पर्यावरण विभाग और खनिज विभाग तक पहुंचाई गई थीं।
अब सवाल यह है कि—
उस शिकायत पर क्या जांच हुई?
क्या मौके का निरीक्षण किया गया?
क्या राखड़ के नमूने लिए गए?
क्या किसी अधिकारी ने रिपोर्ट तैयार की?
क्या किसी तरह की अनुमति या स्वीकृति सामने आई?
और यदि शिकायत सही पाई गई थी तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों से सार्वजनिक होना चाहिए।
CSR और जनसुनवाई के वादों का भी हो सार्वजनिक ऑडिट
इसके साथ ही ग्रामीणों की मांग है कि पावर प्लांट की जनसुनवाई के दौरान किए गए वादों तथा CSR के तहत प्रभावित गांवों में किए गए खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
किस गांव में कितनी राशि खर्च हुई, किस मद में खर्च हुई, किन विकास कार्यों पर राशि लगी, कितने कार्य पूरे हुए और कितने प्रस्तावित हैं—इनका विवरण ग्राम पंचायतों और जिला प्रशासन के माध्यम से सार्वजनिक किए जाने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
मामला किसी कंपनी विशेष के विरुद्ध आरोप लगाने का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय नियमों के पालन और ग्रामीणों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है।
इसलिए जिला प्रशासन, खनिज विभाग, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल तथा संबंधित अन्य विभागों से मांग है कि मौके का संयुक्त निरीक्षण कर—
फ्लाई ऐश की मात्रा, डालने की विधि, mine closure plan, 25 प्रतिशत ash mixing की स्थिति, संबंधित अनुमति-पत्र, EC/CTO की शर्तें, groundwater quality, आसपास के बोरवेल तथा वन क्षेत्र पर संभावित प्रभाव की वैज्ञानिक जांच कराई जाए।
जांच पूरी होने तक यदि प्रथम दृष्टया पर्यावरणीय जोखिम दिखाई देता है तो संबंधित स्थल पर राखड़ डालने की प्रक्रिया को रोकने अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा उचित अंतरिम सुरक्षा उपाय लागू करने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
जनहित में सबसे जरूरी सवाल यही है—यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो संबंधित विभाग और पावर प्लांट आवश्यक अनुमति एवं अनुपालन दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट क्यों न करें?
नोट: यह समाचार स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारी के अनुसार उठाए गए पर्यावरणीय सवालों और उपलब्ध नियमों के आधार पर जनजागरूकता के उद्देश्य से है। किसी व्यक्ति, अधिकारी अथवा कंपनी पर कोई अनियमितता अंतिम रूप से आरोपित नहीं की जा रही है। वास्तविक स्थिति सक्षम विभाग की जांच और आधिकारिक दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी।














