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सात लाख रुपये के चेक अनादरण मामले में न्यायालय का बड़ा फैसला, राकेश कुमार गुप्ता दोषसिद्ध; छह माह साधारण कारावास और 7 लाख रुपये प्रतिकर की सजा

क्राइम 31 October 2026 (133)

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प्रभात न्यूज़ 24: 

सात लाख रुपये के चेक अनादरण मामले में न्यायालय का बड़ा फैसला, राकेश कुमार गुप्ता दोषसिद्ध; छह माह साधारण कारावास और 7 लाख रुपये प्रतिकर की सजा



बलौदाबाजार। 

चेक अनादरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण परिवाद प्रकरण में न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए अभियुक्त राकेश कुमार गुप्ता को दोषसिद्ध करार दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बलौदाबाजार की अदालत ने परिवाद प्रकरण क्रमांक 678/2025, पंकज यदु बनाम राकेश कुमार गुप्ता में दिनांक 31 अक्टूबर 2026 को अपना निर्णय सुनाया। न्यायालय ने परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत अभियुक्त को दोषी पाते हुए छह माह के साधारण कारावास तथा परिवादी को 7 लाख रुपये प्रतिकर अदा करने का आदेश दिया है।

यह मामला सात लाख रुपये के कथित निजी उधार लेन-देन और उसके बदले दिए गए चेक के बैंक में अनादरित होने से संबंधित है। न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों, परिवादी एवं अभियुक्त के बयानों, अधिवक्ताओं की दलीलों तथा संबंधित कानूनी प्रावधानों का परीक्षण करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियुक्त चेक पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार करने के बावजूद कानून के तहत उत्पन्न हुई वैधानिक उपधारणा का पर्याप्त खंडन नहीं कर सका।



तीन माह में रकम लौटाने का किया था वादा

प्रकरण में परिवादी पंकज यदु, पिता स्वर्गीय ललित कुमार यदु, निवासी रामसागर तालाब के सामने बलौदाबाजार ने न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया था। 



परिवादी की ओर से अधिवक्ता महान मिश्रा ने पैरवी की।

परिवाद के अनुसार परिवादी और अभियुक्त राकेश कुमार गुप्ता, पिता मदनलाल गुप्ता, निवासी गांधी चौक बलौदाबाजार के बीच पहले से जान-पहचान एवं मित्रतापूर्ण संबंध थे। इसी परिचय और आपसी विश्वास के आधार पर दोनों के बीच पहले भी रुपयों का लेन-देन होता रहा था।



परिवादी के अनुसार अभियुक्त ने घरेलू कार्य के लिए रुपयों की आवश्यकता बताते हुए 15 जनवरी 2025 को उससे सात लाख रुपये उधार मांगे थे। अभियुक्त ने कथित रूप से तीन माह के भीतर पूरी रकम वापस करने का आश्वासन दिया था। इसके बाद परिवादी ने रुपयों की व्यवस्था कर 30 जनवरी 2025 को सात लाख रुपये नकद अभियुक्त को दिए।

परिवाद में बताया गया कि निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी जब अभियुक्त ने रकम वापस नहीं की तो परिवादी ने 30 मई 2025 को उससे अपनी राशि लौटाने की मांग की। इस पर अभियुक्त ने भारतीय स्टेट बैंक, अंबुजा सीमेंट रवान शाखा स्थित अपने बैंक खाते से सात लाख रुपये का चेक जारी किया।



बैंक में प्रस्तुत करते ही अनादरित हुआ सात लाख का चेक

न्यायालय में प्रस्तुत परिवाद के मुताबिक अभियुक्त ने परिवादी को चेक क्रमांक 474092, दिनांक 30 जून 2025, राशि 7,00,000 रुपये प्रदान किया था। परिवादी ने उक्त चेक अपने बैंक खाते के माध्यम से भुगतान प्राप्त करने के लिए केनरा बैंक शाखा बलौदाबाजार में जमा किया।



लेकिन 1 जुलाई 2025 को बैंक से प्राप्त रिटर्न मेमो में चेक को 'Funds Insufficient' अर्थात खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण अनादरित होना बताया गया।

इसके बाद परिवादी ने अभियुक्त से संपर्क कर राशि भुगतान करने की मांग की। परिवादी के कथन के अनुसार उसे रकम देने से इनकार कर दिया गया। इसके पश्चात परिवादी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से 28 जुलाई 2025 को कानूनी मांग सूचना पत्र भेजा। न्यायालय में प्रस्तुत डाक दस्तावेजों के अनुसार अभियुक्त ने उक्त डाक लेने से इनकार कर दिया था।



कानूनी नोटिस के बावजूद निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर परिवादी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 एवं 142 के अंतर्गत न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया।



न्यायालय में पेश किए गए महत्वपूर्ण दस्तावेज

सुनवाई के दौरान परिवादी पंकज यदु ने धारा 145 परक्राम्य लिखत अधिनियम के अंतर्गत शपथपत्र के माध्यम से अपना साक्ष्य प्रस्तुत किया। इसके साथ ही मामले से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज भी न्यायालय के समक्ष रखे गए।

इन दस्तावेजों में केनरा बैंक में चेक जमा करने की पर्ची, सात लाख रुपये का मूल चेक, बैंक द्वारा जारी चेक अनादरण रिटर्न मेमो, कानूनी नोटिस भेजने की पोस्टल रसीद तथा अभियुक्त द्वारा डाक लेने से इनकार किए जाने से संबंधित बंद लिफाफा शामिल था।

न्यायालय ने इन दस्तावेजों का परीक्षण करते हुए पाया कि चेक निर्धारित वैध अवधि के भीतर बैंक में प्रस्तुत किया गया था। बैंक से चेक अनादरित होने की सूचना मिलने के बाद निर्धारित 30 दिनों की अवधि के भीतर कानूनी मांग सूचना पत्र भी भेजा गया था।

न्यायालय ने यह भी माना कि अभियुक्त के पते पर भेजे गए पंजीकृत डाक को लेने से इनकार किए जाने की स्थिति में, प्रस्तुत परिस्थितियों और दस्तावेजों के आधार पर नोटिस की तामील विधिवत मानी जा सकती है।

इस प्रकार अदालत ने चेक अनादरण, कानूनी नोटिस तथा निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किए जाने से संबंधित विचारणीय प्रश्नों का उत्तर परिवादी के पक्ष में दिया।



अभियुक्त ने कहा- न तो सात लाख रुपये उधार लिए और न ही चेक दिया

मामले की सुनवाई के दौरान अभियुक्त राकेश कुमार गुप्ता ने अपने बचाव में परिवादी से सात लाख रुपये उधार लेने से इनकार किया। अभियुक्त का कहना था कि उसने परिवादी से कोई रकम नहीं ली और न ही उसे उक्त चेक दिया था।

हालांकि, न्यायालय में प्रतिपरीक्षण के दौरान अभियुक्त ने एक महत्वपूर्ण तथ्य स्वीकार किया कि प्रकरण में प्रस्तुत चेक उसी का है और उस पर किए गए हस्ताक्षर भी उसके ही हैं। अभियुक्त ने यह जरूर कहा कि चेक में नाम, राशि और दिनांक की प्रविष्टियां उसके द्वारा नहीं भरी गई थीं।

यही स्वीकारोक्ति मामले की सुनवाई में महत्वपूर्ण कानूनी पहलू बनी। न्यायालय ने इस तथ्य पर विचार किया कि जब अभियुक्त चेक पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार करता है, तब परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 118 और 139 के अंतर्गत चेक प्रतिफल के लिए जारी किए जाने तथा किसी वैध ऋण या दायित्व के निर्वहन में दिए जाने की वैधानिक उपधारणा उत्पन्न होती है।



खाली चेक में दूसरे व्यक्ति द्वारा विवरण भरना अपने आप में अवैध नहीं

सुनवाई के दौरान अभियुक्त की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि चेक में नाम, रकम और तारीख उसके द्वारा नहीं लिखी गई थी। इस संबंध में न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय Bir Singh बनाम Mukesh Kumar (2019) 4 SCC 197 के सिद्धांतों का उल्लेख किया।

इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने स्वेच्छा से हस्ताक्षरित चेक किसी दूसरे व्यक्ति को दिया है, तो चेक में राशि और अन्य विवरण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरे जाने मात्र से चेक अमान्य नहीं हो जाता। यदि चेक विधिक रूप से वैध है और उस पर हस्ताक्षर चेक जारी करने वाले व्यक्ति के हैं, तो अन्य आवश्यक शर्तें पूरी होने पर धारा 138 के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

इसी कानूनी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने माना कि केवल यह कहना कि चेक की अन्य प्रविष्टियां अभियुक्त की लिखावट में नहीं हैं, अपने आप में उसके बचाव को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।



धारा 118 और 139 की वैधानिक उपधारणा बनी फैसले का महत्वपूर्ण आधार

इस मामले में न्यायालय के निर्णय का एक महत्वपूर्ण आधार परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 118(क) और धारा 139 रही।

धारा 118(क) के अनुसार सामान्यतः यह उपधारणा की जाती है कि परक्राम्य लिखत प्रतिफल के लिए बनाई गई है, जब तक इसके विपरीत साबित न हो जाए।

वहीं धारा 139 के अनुसार यह माना जाता है कि चेक धारक ने चेक किसी ऋण अथवा अन्य वैध दायित्व के पूर्ण या आंशिक निर्वहन के लिए प्राप्त किया है, जब तक इसका खंडन नहीं कर दिया जाता।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित फैसले Rangappa बनाम Sri Mohan, Criminal Appeal No. 1020/2010 का भी उल्लेख किया। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि धारा 139 के अंतर्गत बनने वाली उपधारणा में वैध रूप से वसूली योग्य ऋण या दायित्व का अस्तित्व भी शामिल है।

हालांकि यह उपधारणा अंतिम या अटल नहीं होती। अभियुक्त को अपने बचाव में संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर ऐसे तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार है, जिनसे यह प्रतीत हो कि चेक किसी वैध ऋण के भुगतान के लिए जारी नहीं किया गया था।

लेकिन वर्तमान प्रकरण में न्यायालय ने पाया कि अभियुक्त की ओर से केवल ऋण लेने से इनकार करना और चेक की अन्य प्रविष्टियां स्वयं नहीं भरने की बात कहना वैधानिक उपधारणा का पर्याप्त खंडन नहीं कर सका।

सात लाख रुपये देने की आर्थिक क्षमता पर भी हुई सुनवाई

मामले में अभियुक्त की ओर से यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि परिवादी ने सात लाख रुपये नकद देने की अपनी आर्थिक क्षमता को पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं किया। परिवादी की आयकर विवरणी तथा आर्थिक स्थिति से संबंधित दस्तावेजों का सवाल भी उठाया गया।



इस पर न्यायालय ने संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक सिद्धांतों पर विचार किया। अदालत ने माना कि जब चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार कर लिए जाते हैं और धारा 118 तथा 139 के अंतर्गत वैधानिक उपधारणा उत्पन्न होती है, तब उस उपधारणा का खंडन करने का भार अभियुक्त पर आ जाता है।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि यदि अभियुक्त को परिवादी की आर्थिक क्षमता पर संदेह था तो उसे इस संबंध में अपना बचाव उचित समय पर स्पष्ट रूप से रखना चाहिए था। केवल अंतिम बहस के दौरान आर्थिक क्षमता पर सवाल उठाना, जबकि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए गए हों और बचाव के समर्थन में पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत न की गई हो, पर्याप्त नहीं माना जा सकता।



न्यायालय के अनुसार अभियुक्त ऐसा कोई ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि परिवादी द्वारा बताए गए ऋण का अस्तित्व नहीं था।

परिवादी के साक्ष्य का प्रभावी खंडन नहीं कर सका बचाव पक्ष

न्यायालय ने अपने निर्णय में परिवादी के शपथपत्रीय साक्ष्य और प्रतिपरीक्षण के दौरान दिए गए उत्तरों का परीक्षण किया। अदालत के अनुसार परिवादी ने सात लाख रुपये उधार देने के संबंध में अपना कथन प्रस्तुत किया और प्रतिपरीक्षण में इस संबंध में उसके बयान का कोई प्रभावी खंडन नहीं किया जा सका।

दूसरी ओर अभियुक्त ने चेक पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार किए, लेकिन यह साबित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया कि चेक किसी अन्य उद्देश्य से दिया गया था अथवा उसके ऊपर परिवादी का कोई वैध ऋण या दायित्व नहीं था।

इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय ने माना कि अभियुक्त धारा 118 एवं धारा 139 के अंतर्गत उत्पन्न वैधानिक उपधारणा का संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर खंडन करने में असफल रहा।



न्यायालय ने पांचों विचारणीय प्रश्नों पर दिया निष्कर्ष

इस परिवाद प्रकरण में न्यायालय ने मुख्य रूप से पांच विचारणीय प्रश्न निर्धारित किए थे। इनमें सात लाख रुपये के ऋण के बदले चेक जारी किया जाना, चेक का बैंक में अनादरित होना, कानूनी मांग सूचना पत्र का निर्धारित अवधि में भेजा जाना, नोटिस के बाद 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया जाना तथा अभियुक्त को दोषसिद्ध या दोषमुक्त करने का प्रश्न शामिल था।



न्यायालय ने दस्तावेजों, मौखिक साक्ष्य और कानूनी प्रावधानों के परीक्षण के बाद सभी आवश्यक प्रश्नों का उत्तर परिवादी के पक्ष में दिया।

अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियुक्त द्वारा चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए जाने के बाद उत्पन्न वैधानिक उपधारणा का पर्याप्त खंडन नहीं किया गया। इस प्रकार धारा 138 के अपराध के आवश्यक तत्व प्रमाणित पाए गए।



छह माह साधारण कारावास और सात लाख रुपये प्रतिकर का आदेश

समस्त साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बलौदाबाजार की अदालत ने परिवाद प्रकरण क्रमांक 678/2025 में दिनांक 31 अक्टूबर 2026 को अपना निर्णय सुनाया।

न्यायालय ने अभियुक्त राकेश कुमार गुप्ता को परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत दोषसिद्ध घोषित करते हुए छह माह के साधारण कारावास तथा परिवादी को 7,00,000 रुपये प्रतिकर के रूप में अदा करने की सजा सुनाई।

निर्णय के साथ संबंधित अभिरक्षा प्रमाणपत्र तैयार करने तथा निर्णय की प्रति अभियुक्त को निःशुल्क उपलब्ध कराने का आदेश भी दिया गया। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि अभियुक्त का जमानत मुचलका निर्णय के छह माह बाद उन्मोचित समझा जाएगा।



चेक अनादरण के मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी संदेश

यह फैसला चेक के माध्यम से होने वाले आर्थिक लेन-देन में सावधानी और कानूनी जिम्मेदारी के महत्व को रेखांकित करता है। चेक जारी करने वाले व्यक्ति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके खाते में भुगतान के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध हो और उसके द्वारा दिए गए चेक से संबंधित दायित्वों का समय पर निर्वहन किया जाए।

साथ ही, चेक अनादरण के मामलों में केवल हस्ताक्षर स्वीकार करना ही पूरे मामले का अंतिम निर्णय नहीं होता। कानून अभियुक्त को वैधानिक उपधारणा का खंडन करने का पूरा अवसर देता है, लेकिन इसके लिए केवल सामान्य इनकार के बजाय विश्वसनीय परिस्थितियां और साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक होता है।



बलौदाबाजार न्यायालय का यह निर्णय स्थानीय स्तर पर चेक अनादरण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन सकता है।

न्यायालय: पूजा चन्द्रा, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)

प्रकरण क्रमांक: 678/2025

परिवादी: पंकज यदु

अभियुक्त: राकेश कुमार गुप्ता

निर्णय दिनांक: 31 अक्टूबर 2026

दोषसिद्धि: परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138

सजा: छह माह साधारण कारावास एवं 7 लाख रुपये प्रतिकर।



प्रभात न्यूज़ 24 | बलौदाबाजार



नोट: यह समाचार न्यायालय के उपलब्ध निर्णय में वर्णित तथ्यों एवं निष्कर्षों पर आधारित है। इसमें किसी पक्ष के विरुद्ध न्यायालय के निष्कर्षों से आगे बढ़कर कोई आरोप नहीं लगाया गया है। निर्णय के विरुद्ध उपलब्ध वैधानिक अपील अथवा अन्य कानूनी उपायों का अधिकार संबंधित पक्ष को कानून के अनुसार प्राप्त है।



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